1muhabbat kee thi to nibhaee to hotikoee pyar kee jyoti jalaee to hotibhoole se gar khata ho gaee thi hamasekabhi aakar tumane bataee to hotiauron ko vafa kee sikh dene valeye sikh khud toone apanaee to hotivafa ka bevafaee se kyoon diya silakamiyan kya thi ginaeen to hoti'anuja' mujh pe likh dali kitab toonekoee gazal khud pe banaee to hoti-----
---.2
aadat ho gaee hai sabakee, juban se firana aajakalaho gaya hai ik shauk, muhabbat karana aajakaladil har roj jane kitane cheharon pe marata haiho gaya hai kis kadar aasan marana aajakalajism tak hi mahadood kyon ho gaee har nazarakyon nahin chahata koee dil men utarana aajakalamashahoor hone ke lie ye kaisa divanapan haikarate hain pasand nazaron se bhi girana aajakalaaankh band karake yakeen kar lete ho sab par tumahai bevakoofi 'anuja' aisa kuchh karana aajakala--------
.3
aankhon men basa lijepalakon pe bitha lijesurkhi banakar mujhakohothon pe laga lijefool banakar mujhakobalon men saja lijechunari banakar mujhakosine se laga lijekangana banakar mujhakohathon men saja lijebindiya banakar mujhakomathe par laga lijesindoor banakar mujhakomang men saja lijekuchh bhi bana lije paramujhako apana bana lije.
Tuesday, May 20, 2008
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5 comments:
अगर मैं अपनी जुबान से जाउं
यार मिरे अपनी जान से जाउं
होने लगे अगर खुद पे गुमान
यार मैं अपनी पहचान से जाउं
दिल रोक लेता है परदेस जाने से
जब भी सोचूं कि हिंदुस्तान से जाउं
तमन्ना है लिपटा हो तिरंगा मुझपे
जब भी मैं इस जहान से जाउं
आखिरी सफर पे बड़ी शान से जाउं
जो यहां है वो कहां मिलेगा
घर छोड़ूं क्यूं हिंदुस्तान से जाउं
वतन के काम न आउं तो खुदा
मान से अपने सम्मान से जाउं
अनुज करूं गर दुखी किसी को
खुदा करे मैं मुस्कान से जाउं
-----
क्या था और क्या हो गया हिन्दुस्तान, बापू देखने चले आओ
कैसे -कैसे हाथों में है तेरे देश की कमान, बापू देखने चले आओ
सत्य-अहिंसा, त्याग-तपस्या की दी थी आपने हमको शिक्षा
इसपे अमल करना छोड़ गया क्यूं इन्सान, बापू देखने चले आओ
पश्चिमी हवा चल रही है बापू हर चीज यहां की बदल रही है बापू
हर दिन हो रहा है छोटा नारी का परिधान, बापू देखने चले आओ
शहीदों की तस्वीरें लगी मिलती नहीं अब किसी घर की दीवारों पर
ले लिया अब फिल्म स्टार,क्रिकेटरों ने इनका स्थान, बापू देखने चले आओ
ईमानदारी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है बापू संस्कार धीरे-धीरे मर रहे हैं
महिलाओं की कदर है न यहां बुर्जुगों का सम्मान, बापू देखने चले आओ
अफसोस! वतन के लिए वक्त है ही नहीं आज कल के आदमी के पास
खुद तक ही महदूद हो गया क्यूं आज का इंसान, बापू देखने चले आओ
सर्वाधिकार : प्रकाशकाधीन
प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन 2005
डी. सी. निवास के सामने, करनाल रोड
कैथल-136027 (हरियाणा)
फोन 01746-235862, 309229
आवरण : आनंद अकीन
मुद्रक : सुकीर्ति प्रिंटर्ज,
करनाल रोड, कैथल
मुख्य वितरक : अक्षरधाम समिति (रजि.)
(भारत की सर्वाधिक पुस्तक मेले आयोजित करने वाली संस्था)
करनाल रोड, कैथल-136027 (हरियाणा)
मूल्य : 40/-चालीस रुपये मात्र
समर्पण
परम पूजनीय माँ श्रीमती चाँद कौर
एव्
पिता श्री हुक्म चन्द जी
को सादर समर्पित
कौन उतरा है भला किसकी उम्मीदों पे खरा
औरों को क्या देखते हो, खुद को ही देख लो
तू बेवफाई कर रहा है इसमें खता नहीं तेरी
आजकल तेरे शहर का मौसम ही ऐसा है
दौलत, शोहरत की हसरत नहीं है मुझे
मालूम है कफन में जेब नहीं होती
सबर तो किजीए कि रात भी होगी
चाँद भी निकलेगा ज़माना भी देखेगा
इस प्रयास के बारे में
हरियाणा में ग़ज़ल विधा विषयक असंख्य 'ग़ज़ल-संग्रह' प्रकाशित हो चुके हैं। साहित्य क्षेत्र में अनेक लेखकों की लेखनी मंज चुकी हैं। परन्तु इस क्षेत्र में एक नया नाम है-अनुज नरवाल 'रोहतकी'। इनकी ग़ज़लें, कविताएँ, कहानियाँ कई प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में तो प्रकाशित होती रही हैं परन्तु ग़ज़ल-संग्रह 'वो जैसा भी है मेरा है' इनका पहला प्रयास है। जिला सोनीपत के गाँव कथूरा में जन्मे अनुज नरवाल, फिलहाल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ये सरल स्वभाव, स्पष्टवादिता, एवं सादगी पूर्ण जीवन में विश्वास रखते हैं। अच्छे ख्याल, मुहावरा बन्दी, व्यंग्य, यथार्थवाद आदि सभी पुटों का समावेश इनकी ग़ज़लों में दिखाई पड़ता है। इनकी ग़ज़लों के कुछ शे'र जिनमें व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है-
दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है,
हो गया किस कदर आसान मरना आजकल।
नफरत से करता है यह मुहब्बत बहुत
अजीब मिज़ाज वाला है तुम्हारा शहर।
आज के यर्थाथवादी युग में शायर ने कल्पना से दूर रहकर हकीकत से रू-ब-रू कराने का प्रयास किया है-
ज़िस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र,
क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल।
किसको क्या लेना किसी के गम से,
सबको ख्याल अपनी खुशी का है।
आज के भौतिकवादी युग में सभी सुख-सुविधाओं के होते हुए भी मनुष्य निराश और हताश नज़र आता है परन्तु इस शायर के शे'रों में आशावाद की झलक साफ दिखाई देती है-
आस न छोड़ उससे इंसाफ की,
खुदा के घर देर है अंधेर नहीं।
शबे-तार भी हो जाती है तबदील सुबह में 'अनुज',
फिर मुझे न मिलेगा प्यार कब तक आखिर कब तक।
शायर समाज के प्रति सचेत दिखाई देता है। पारिवारिक बिखराव, रिश्तों की टूटन, स्वार्थपरक व्यवहार आदि मोज़ू शायर से अछूते नहीं रहे हैं।
जमाने लग जाते हैं जिन रिश्तों को बनाने में
इक लम्हा भी नहीं लगता उनको टूट जाने में
उजले जिस्म की चाह रखने वालों,
कीमते-साफ दिल तुम्हें पता नहीं।
तुम तो चाहो दौलत-शोहरत,
कदर वफा की कब करते हो।
मुहावराबन्दी पर आधारित शायर के कुछ अशआर-
पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती,
बे वजह मुझको बुरा बताने वाले।
मुँह-दर-मुँह रहता था जो कभी मेरी नज़रों के,
ईद का चाँद हो गया है आज दीदार यार का।
शायर कम उम्र में ही नाम की बुलन्दियों को छूने की चाहत रखता है। इसी चाहत को दर्शाता हुआ उनका ये शे'र-
'गालिब' 'मीर' 'ज़ोक' की तरह जानेंगे लोग तुम्हें भी,
जीवन के हर पहलू पे 'अनुज' ग़ज़लें लिखते रहना।
मैं कामना करती हूँ कि भविष्य में अनुज नरवाल साहित्य जगत को ऐसे ही अनमोल मोतियों से नवाज़ते रहें। आशा है कि पाठक इनके ग़ज़ल संग्रह का तहेदिल स्वागत करेंगे। आखिर में अनुज की लिखी चन्द पंक्तियों के साथ अपनी शुभकामनाएं देना चाहूँगी।
दिल में लगन हो सच्ची तो हमने तकदीर को बदलते देखा है
तोड़कर हर दीवार जमाने की राँझे से हीर को मिलते देखा है
-डॉ. कमला देवी
876, सेक्टर 19-प्प्, अर्बन एस्टेट, कैथल
लेखक की ओर से
मानसिक भावनाओं की अभिव्यक्ति मानव समाज की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। मनुष्य समाज में रहकर जो देखता है, सुनता है एवं पढ़ता है, वह उसे किसी न किसी माध्यम से व्यक्त करना आवश्यक समझता है। मैंने भी अपने और अपने आस-पास से जुड़े अनुभवों को अपने ग़ज़ल-संग्रह 'वो जैसा भी है मेरा है' के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा-सा प्रयास किया है। लेकिन पाठकों की कसौटी पर मैं कहाँ तक खरा उतर पाऊँगा। इसका निर्णय तो पाठक वर्ग द्वारा प्रदत्त स्नेह पर निर्भर करता है।
लेखन कार्य को समृध्द बनाने के लिए पाठकों की प्रतिक्रियायें एवं सुझावों का विशेष योगदान होता है इसलिए मुझे पाठकों की राय का बेसब्री से इंतजार रहेगा। जिससे मेरे लेखन कार्य को और सही दिशा मिल सकेगी और भविष्य में मैं पाठक वर्ग की कसौटी पर खरा उतरने की अनवरत कोशिश कर सकूंगा।
प्रेम सहित।
-अनुज नरवाल 'रोहतकी'
सम्पर्क :-
454/33 नया पड़ाव, काठ मण्डी,
रोहतक-124001
ख़ास-शुक्रगुज़ार
तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ- अपनी दीदी डॉ. कमला देवी का जिन्होंने मेरी बिखरी हुई ग़ज़लों को यकजा करके एक ग़ज़ल संग्रह की सूरत दी है।
तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ- संस्थापक अदबी संगम के शायर नाना जी श्री दोस्त भारद्वाज जी का जिनके प्रति मेरे अन्तस् में उनकी विद्वता और गुणवत्ता की छाप अंकित है।
तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ- स्टेट बैंक कैथल में कार्यरत शायर ज़नाब गुलशन मदान का जिन्होंने समय-समय पर मुझे अनुगृहित किया।
तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ-अपने परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों का जिन्होंने समय-समय पर मेरी रचनाओं को सुनकर हौसला अफ़ज़ाई की।
तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ-उस शख्स का जिसके ख्याल मात्र से ही मैं ग़ज़ल-यात्रा के इस दुर्गम पड़ाव पर पहुँच सका हूँ। उन्हें धन्यवाद देना स्वयं को धन्यवाद देने जैसा ही होगा। अत: मौन स्वीकृति में ही उनको धन्यवाद देना चाहूँगा।
-अनुज नरवाल 'रोहतकी'
-,-,-,-,-,
1.
मुहब्बत की थी तो निभाई तो होती
कोई प्यार की ज्योति जलाई तो होती
भूले से गर खता हो गई थी हमसे
कभी आकर तुमने बताई तो होती
औरों को वफा की सीख देने वाले
ये सीख खुद तूने अपनाई तो होती
वफा का बेवफाई से क्यूं दिया सिला
कमियां क्या थी गिनवाई तो होती
'अनुज' मुझपे लिख डाली किताब तूने
कोई ग़ज़ल खुद पे बनाई तो होती
---
2.
आदत हो गई है सबकी, जुबान से फिरना आजकल
हो गया है इक शौक, मुहब्बत करना आजकल
दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है
हो गया है किस कदर आसान मरना आजकल
ज़िस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र
क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल
मशहूर होने के लिए ये कैसा दीवानापन है
करते हैं पसन्द नज़रों से भी गिरना आजकल
आंख बंद करके यकीं कर लेते हो सब पर तुम
है बेवकूफी 'अनुज' ऐसा कुछ करना आजकल
---3.
किताब-ए इश्क पढ़ते रहना, शरहें1, लिखते रहना
कागज-ए-दिल पे अपनी सारी बातें लिखते रहना
किसने तेरा गम बाँटा और किसने ताने दिए
तुमने जुदाई में कैसे काटी रातें लिखते रहना
यादों के तूफां उठे कब-कब दिल के समन्दर में
कब-कब बेताब हुई मिलने को धड़कनें लिखते रहना
जहन में क्या-क्या चली हैं बातें मुझको ले लेकर
तेरी आँखों ने क्या देखें, सपनें लिखते रहना
खोए हुए मेरे चेहरे को ढूँढा तुमने कब तक आखिर
ढूंढ रही थी कहाँ-कहाँ मुझको आँखें लिखते रहना
'गालिब' 'मीर' 'ज़ोक' की तरह जानेंगे लोग तुम्हें भी
जीवन के हर पहलू पे 'अनुज' ग़ज़लें लिखते रहना।
---
1. शरहें - व्याख्या
4.
चोरी-चोरी मुझको यूँ न देखा कर
क्या-क्या कहेंगे लोग जरा-समझा कर
नींद से बोझल हैं पलकें अब तलक तेरी
मेरी खातिर तू इतना भी न जागा कर
मुझे सोचने में कहीं भूल न जाओ खुद को ही
सोचाकर मुझे मगर इतना भी न सोचा कर
आना है तो आ जाओ जिन्दगी में मेरी
या फिर तू सपनों में भी न आया कर
इश्के-'अनुज' में रंगे-हकीकत नज़र आएगा
दिल को देखाकर, सूरत पे न जाया कर
---5.
आँखों में बसा लीजे
पलकों पे बिठा लीजे
सुर्खी बनाकर मुझको
होठों पे लगा लीजे
फूल बनाकर मुझको
बालों में सजा लीजे
चुनरी बनाकर मुझको
सीने से लगा लीजे
कंगना बनाकर मुझको
हाथों में सजा लीजे
बिंदिया बनाकर मुझको
माथे पर लगा लीजे
सिंदुर बनाकर मुझको
मांग में सजा लीजे
कुछ भी बना लीजे पर
मुझको अपना बना लीजे।
---6.
अपना लीजिए या ठुकरा दीजिए
फैसला आज मगर सुना दीजिए
अपना कहने में मुझे, आए गर हया तुझे
समझ जाऊँगा बस मुस्कुरा दीजिए
तुमको चाहता हो गर कोई मेरे सिवा
मुकाबला उसका मुझसे करा दीजिए
तेरी गोद में रखकर सिर सो जाऊँगा
मेरे बालों में हाथ फिरा दीजिए
जिंदगी जीने में आसान हो जायेगी
मये-मुहब्बत मुझको पिला दीजिए
सब कुछ अपना बना लीजे इश्क को
फर्क, धर्म, जात का ये मिटा दीजिए
शेख जी खुद को जो भी कहे पारसा
आईना आज उसको दिखा दीजिए
आने वाला है अब महफिल में 'अनुज'
कहीं दिल, कहीं पलकें बिछा दीजिए।
---7.
दिल बना है मेरा शायद गम छिपाने को
आँखें दी हैं खुदा ने आँसू बहाने को
जब से छोड़ा है उसने मुझ दीवाने को
प्यारा लगने लगा हूँ मैं भी जमाने को
उसकी जरूरत है न उसका प्यार लाज़मी
है उसकी याद बहुत दिल बहलाने को
वो नज़र न आई नज़र जो पहचाने मुझे
यूँ तो आँखें दी हैं खुदा ने जमाने को
जहाँ में और भी रहते हैं मेरे सिवा
सबको मिलता है क्यूँ 'अनुज' ही सताने को
---8.
खुद को मेरा दोस्त बताने वाले
तुम भी निकले मुझे सताने वाले
झूठे भी हो तुम फरेबी भी हो
सब हुनर हैं तुझमें जमाने वाले
पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती
बेवजह मुझको बुरा बताने वाले
मेरे दीदार को तरसते थे कभी
आज हमसे यूँ नज़र चुराने वाले
दिल आसूदा है, तेरा दर्द पाकर भी
ओ बन्दा-नवाज मुझे भुलाने वाले
दिल मुश्ताक़े दीद है 'अनुज' का
मुझको यादों से मिटाने वाले
---9.
करूं मैं तेरा इंतजार कब तक आखिर कब तक
चलेंगी ये साँसे चार कब तक आखिर कब तक
मुझसे मिलने का इरादा तो बना, कोशिश तो कर
सोएंगे ये पहरेदार कब तक आखिर कब तक
मुझे अब ओर कोई काम नहीं इस जिद्द के सिवा
होगा न तेरा दीदार कब तक आखिर कब तक
कभी न कभी तो आएगा दौर उल्फ़ते-रूहानी का
ज़िस्म बिकेगा सरे बाज़ार कब तक आखिर कब तक
शबे-तार भी हो जाती है तबदील सुबह में 'अनुज'
फिर मुझे न मिलेगा प्यार कब तक आखिर कब तक
---9.
करूं मैं तेरा इंतजार कब तक आखिर कब तक
चलेंगी ये साँसे चार कब तक आखिर कब तक
मुझसे मिलने का इरादा तो बना, कोशिश तो कर
सोएंगे ये पहरेदार कब तक आखिर कब तक
मुझे अब ओर कोई काम नहीं इस जिद्द के सिवा
होगा न तेरा दीदार कब तक आखिर कब तक
कभी न कभी तो आएगा दौर उल्फ़ते-रूहानी का
ज़िस्म बिकेगा सरे बाज़ार कब तक आखिर कब तक
शबे-तार भी हो जाती है तबदील सुबह में 'अनुज'
फिर मुझे न मिलेगा प्यार कब तक आखिर कब तक
---10.
मेरे खत का कुछ यूँ जवाब भेजा है
बंद लिफाफे में लाल गुलाब भेजा है
बू-ए-वफा आ रही है इस गुल से
नए तौर से इश्क का ख़िताब भेजा है
जश्न का माहौल है आज मेरे दिल में
मेरे सवाल का सही जवाब भेजा है
मुरझाया हुआ चेहरा फिर खिल गया
मेरे लिए ईलाज-ए-इज्तिराब भेजा है
'अनुज' खोल दी है तेरी किस्मत उसने
बनाके हकीकत हर ख्वाब भेजा है
---11.
नींव पड़ी थी अपने रिश्तों की
बात हो जैसे कई बरसों की
मिलते थे जहाँ पे छुप-छुप के
याद है, बाड़ थी वह सरसों की
बिछुड़े मुद्दत हुई हमें फिर भी
बात लगती है कल-परसों की
तुम तो इक साल भी न साथ चले
बात करते थे सात-जन्मों की
बारहा उसकी याद जो लाएं
छोड़िये बात ऐसे सपनों की
जब भी दिया हमको गम ही दिया
क्या कहें 'अनुज' ऐसे अपनों की
---12.
जिगर में रहकर भी वो जुदा हो जैसे
मगर फिर भी लगे है अपना हो जैसे
मिलता भी है तो ऐसे मिलता है वो
दरमियां जन्मों का फासिला हो जैसे
उसके लिए सबसे लड़ने चला, तो लगा
उसका इश्क मेरा हौसला हो जैसे
ख्वाबों में भी नहीं आता वो आजकल
ऐसे लगता है भूल गया हो जैसे
किसी पे कभी एतबार करके तो देख
लगेगा पत्थर में भी, खुदा हो जैसे
तेरी बातों से साफ पता चलता है
'अनुज' तुमने भी प्यार किया हो जैस
---13.
तुम इक मुद्दत बाद मिले हो
सुनाओ हमें तुम कैसे हो
दिल में रहना छोड़ा तूने
फिर आजकल कहाँ रहते हो
आज भी हमसे रूठे हुए हो
तुम बिल्कुल भी नहीं बदले हो
कह दो जो कुछ भी है कहना
चुपचाप होकर क्यों खड़े हो
लगते हो 'अनुज' तुम भी पागल
जहाँ छोड़ा था वहीं खड़े हो
---14.
बेशक मुझसे आज खफा है
वो जैसा भी है मेरा है
कहने से नहीं टूटते रिश्ते
अपना तो अपना होता है
जीवन में रूठने मनाने का
अपना इक अलग मजा है
वह रूठे हैं तो मन जाएंगे
न मैं बुरा हूँ न वो बुरा है
कहती हैं ये हिचकियां मुझको
याद मुझे वो भी करता है
नींद नहीं मुझको भी आती
वो भी तो तारे गिनता है
मांगी दुआ तुम्हें पाने की
टूटा जब कोई तारा है
तू मिले तो सब मिला समझूं
'अनुज' मुझे जग से क्या लेना है
---15.
जब कभी तुम तनहा बैठोगे
खुद से होकर खफा बैठोगे
यादें मेरी घेरेंगी तुमको
दिल कर जब यकजा बैठोगे
होंगी तभी दूर सब कमियां
लेकर अगर आईना बैठोगे
सबकी नज़र से गिर जाओगे
होकर अगर बेवफा बैठोगे
खुदा भी न करेगा माफ तुम्हें
'अनुज' से अगर जुदा बैठोगे
---16.
मुझको कलेजे से लगाए कोई
जिन्दगी में आप-सा आए कोई
बुझ सके न जो उमर भर के लिए
शम्मा-ए-इश्क ऐसी जलाए कोई
वादा करता हूँ हर खुशी दूंगा
मगर शर्त है वफा निभाए कोई
दिल में है जो वही चेहरे पे हो
हकीकत से रू-ब-रू कराए कोई
मेरी तमन्ना तो है 'अनुज' यही
अपने दिल में मुझे बसाए कोई
---17.
शाख़ से टूटकर पत्ते दोबारा नहीं चिपका करते
दिल से बनाए हुए रिश्ते कभी नहीं टूटा करते
पहला-पहला ये प्यार ही कुछ होता है ऐसा
दिले आशिक जिसको भूलकर भी नहीं भूला करते
प्यार करके वो मुझे भूल गए हो, कैसे मानूं
जो दिल में रहते हैं वो दिल से नहीं जाया करते
मौत तो आती है हमारे तुम्हारे जिस्मों को ही
प्यार के रिश्ते अमर हैं, ये नहीं टूटा करते
जो कहते हो 'अनुज' सच कहते हो इसलिए हम
मुस्तहिके-रब्त तेरे सिवा ओर को नहीं समझा करते
---18.
प्यार का ये पहला ही खत है कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
बातें दिल में आज बहुत हैं समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
खत में पहले क्या लिखते हैं मुझको कुछ मालूम नहीं
तज़रबा नहीं खत लिखने का कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
लिखकर उसका हाल मैं पूंछूं या अपना ही हाल कहूँ
कशमकश में हूँ बड़ी देर से समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
नावाकिफ है जो उल्फत से मेरी अब तक 'अनुज' उसे
राजे दिल मैं कैसे लिखूँ कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
---
19.
हुस्न तेरा इक जलता दरिया
इश्क मेरा है पिघलता दरिया
रूह-बदन गर मिल जाएं दोनों के
दिल बन जाएगा मचलता दरिया
टूटेंगी अगर ये रस्मों की दीवारें
इश्क बन जाएगा चलता दरिया
मत हो खफा तू मेरी वफा से
हिलने दे वफा का हिलता दरिया
बिन हर्फों के 'अनुज' कैसे लिक्खें
रूका है ग़ज़ल का चलता दरिया
---20.
हमसे हर किसी ने बस इतना ही वास्ता रक्खा
सिर्फ गरज के लिए ही हमको अपना आशना रक्खा
हमने जिसको भी चाहा, तहे दिल से चाहा मगर
सभी ने दिलों के दरमियां सदा फासिला रक्खा
जहाँ तक याद है, मैंने सबसे वफा निभाईं है
फिर भी हर किसी ने मेरा नाम बेवफा रक्खा
असलियत जान जाएंगे तो लौट आएंगे वो भी
इसी आस में हमने दरवाजा-ए-दिल खुला रक्खा
अपनों के चेहरे भी आए नज़र बेगाने हमें
जब भी हमने उनके आगे 'अनुज' आईना रक्खा
---21.
तुमसे पहले मैंने किसी पे यकीं किया न था
इस धोखे से पहले कोई धोखा हुआ न था
तेरी नजरों का स्पर्श दिल में घर कर गया
तुमसे पहले तो किसी ने इस तरह देखा न था
क्या पता कैसी होती हैं बियाबान की रातें
शाम के बाद घर से मैं कभी निकला न था
अब मैं समझा उसकी इस नाकामयाबी का सबब
हौसला करके वो पूरा राह पे चला न था
इन हुस्न वालों से न रखिए वफा की उम्मीद
वक्त पे देंगे ये धोखा 'अनुज' यह कहता न था
---22.
पत्थरों पे कर लेना तुम यकीं
लेकिन इन्सानों पर करना नहीं
इन्सां को मुहब्बत मिले जहां से
करता है ये दगा, आखिर वहीं
खुदा-ए-इश्क तुम कहते हो जिसे
मतलबे-इश्क तक उसे पता नहीं
उजले जिस्म की चाह रखने वालों
कीमते-साफदिल तुम्हें पता नहीं
आस न छोड़ उससे इंसाफ की
खुदा के घर देर है अंधेर नहीं
---23.
अब तो वक्त कुछ यूँ गुजारना होगा
अहसां जिन्दगी का उतारना होगा
साथ मेरे कोई चले न चले
खुद को तूफां में उतारना होगा
किसी में बुराई देखने से पहले
हमें खुद को भी तो संवारना होगा
यकीनन दौरे-इश्क आएगा मगर
दिल से इस नफरत को मारना होगा
'अनुज' तनहा सफर नहीं होता
अब हमसफर को पुकारना होगा
---24.
मैं ख्वाबों से निकलना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ-साथ चलना चाहता हूँ
दर्द है क्या, समझाने की खातिर
मैं तुमसे दिल बदलना चाहता हूँ
जिया हूँ मैं इक पत्थर की तरह
अब बनके मोम जलना चाहता हूँ
वफा करने से कुछ हासिल नहीं है
जफा में अब, मैं पलना चाहता हँ
गमों में तो जला हूँ मैं 'अनुज' अब
तेरी खुशियों में ढलना चाहता हूँ
---25.
मुझको तुम अपना कहते हो
इसीलिए अच्छे लगते हो
जिससे मैंने धोखा खाया
तुम भी बिल्कुल उन जैसे हो
कैसे मानूँ बात मैं तेरी
तुम तो दुनिया के झूठे हो
तुम तो चाहो दौलत-शोहरत
कदर वफा की कब करते हो
तुमको प्यार पे यकीं नहीं है
कल उसके थे, अब इसके हो
सच को सच कहते हो 'अनुज'
सबको तुम कड़वे लगते हो
---26.
तुम क्यों ऐसे खफा हो गए
बेवजह बेवफा हो गए
क्या खता थी हमारी भला
बिन बताए जुदा हो गए
ख्वाबों में भी नहीं आते अब
ऐसे क्यूं तुम जुदा हो गए
एक भी न सुनी और 'अनुज'
देखते ही हवा हो गए
---27.
धीरे-धीरे चलना होगा
गिरकर भी संभलना होगा
जीवन के इस राह में यारों
गमों से भी मिलना होगा
बिछड़े हैं जो आज भी हमसे
कल उनसे भी मिलना होगा
गम मिले या खुशियाँ हमको
फूलों जैसा हँसना होगा
जब तक सांस 'अनुज' है बाकी
यादों में ही जलना होगा
---28.
वो जब भी मुझसे मिला करता था
हँस-हँस कर बातें किया करता था
साथ न छोडूंगा किसी कीमत पर
हरदम मुझे यही कहा करता था
हर गम, हर खुशी यूँ बाँटा करते थे
मैं उसको वो मुझे सुना करता था
खरा नहीं उतरा वो अपनी बातों पर
वादे तो बहुत किया करता था
भूल गया वो इस तरह से मुझे
जिस तरह 'अनुज' याद किया करता था
---29.
दर्दे दिल है और आँखों में पानी है
हाँ यही, बस यही, मेरी कहानी है
ऐ खुदा रखना हरा इसको सदा
यह जख्म दोस्त की दी निशानी है
जानी है जबसे हकीकत उसकी
ये दुनिया लगने लगी बेगानी है
मेरा तज़रबा तो कहता है यही
छोटी उमर में इश्क करना नादानी है
सबके इश्क में मिलेगी-बू-ए-हवस
'अनुज' का इश्क उल्फते-रूहानी है
---30.
मरता नहीं कोई किसी से जुदा होने पर
अफसोस जरूर होता है किसी को खोने पर
लम्हात जो होते हैं बीते हुए जमानों के
घेर लेते हैं अक्सर तनहा होने पर
होने लगता है अहसास गमों में खुशी का
जिन्दगी आसान लगती है तज़र्बा होने पर
कौन क्या है और कितने पानी में है
लगता है पता सामने आईना होने पर
दिल में कितनी मुहब्बत है किसके लिए
पता लगता है अक्सर 'अनुज' जुदा होने पर
---31.
सारी जिन्दगी जीते रहे हम ख्वाबों में
होती नहीं खुशबू कभी काग़जी गुलाबों में
जुदा हो गए हम मिलने से पहले ही
कुछ तो रही है कमी हमारे भी हिसाबों में
भूल हो गई हमसे उनको समझने में ही
छिपा रखा था उसने खुद को जो हिज़ाबों में
न रहा कोई हमसे मुहब्बत करने वाला अब
हम भी तो हैं अब जहां के खाना खराबों में
मुहब्बत में वो सब नज़र नहीं आया कभी
हमने जो कुछ भी पढ़ा था 'अनुज' किताबों में
--
(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)
---32.
सिर्फ चाहने से ही चाहत नहीं मिलती
जमाने में सबको मुहब्बत नहीं मिलती
हर चीज के दाम होते हैं लेकिन
मुझे अपनी वफा की कीमत नहीं मिलती
तूफां का रूख बदलने की ताकत है मुझमें
लेकिन आपके बिना हिम्मत नहीं मिलती
जमीं पर गम हैं, जाल हैं रिश्तों के
कज़ा आए बिन जन्नत नहीं मिलती
इश्क नहीं करता 'अनुज' तुमसे अगर
जिन्दगी में उसे यह क़िल्लत नहीं मिलती
---33.
लोग बताते हैं तेरा दीवाना मुझे
अफसोस तुमने ही नहीं पहचाना मुझे
ये बात बेशक दुनिया से पूछ लो
निभाना आता है खूब याराना मुझे
मेरी जिन्दगी में आ जाओ या फिर
छोड़ दो तुम ख्वाबों में सताना मुझे
यकीं कर न कर 'अनुज' सच है मगर
तुमने ही बनाया है दीवाना मुझे
---34.
तोहमत न लगा कि ओर को चाहने लगा हूँ
जरा दिल से पूछ, क्या मैं ऐसा लगता हूँ
माना आज भी तुमसे बिछुड़ा हुआ हूँ
लेकिन अब तलक मैं तुमको नहीं भूला हूँ
तुम भी मेरी यादों को रखते हो ताज़ा
अच्छी तरह से मैं तुमको समझता हूँ
हर मंजर भूल गया मगर तुमको न भूला
सच है कि मैं तुमको दिल से चाहता हूँ
भूलकर शिकवे-गिले पास आ 'अनुज'
राहों में तेरी दिल बिछाए हुए बैठा हूँ
---35.
ये जो शराब है
चीज लाजवाब है
कहता है जो इसे बुरा
वो खुद खराब है
टूटे हुए दिलों के लिए
ये दवा लाजवाब है
पीने से ही ये अपना
जिन्दा शबाब है
---
36.
वो शख्स मेरे सोचने के जैसा नहीं था
था वो खफा मुझसे मगर बेवफा नहीं था
खरीद लेता मैं मुहब्बत सारे जहां की
था दिल तो मेरे पास मगर पैसा नहीं था
प्यास से मर गया था मैं जहाँ पर
था समन्दर वहाँ पर कोई सहरा नहीं था
क्यों किए वादे तूने क्यों खाई कसमें मेरी
परदेश जाकर तुमने अगर आना नहीं था
रौनक थी चेहरे पे 'अनुज' जब तक पास थे
जाने के बाद रौनक का पहरा नहीं था
---37.
इश्क का बहता दरिया हूँ मैं
शहरे-जिगर में बहता हूँ मैं
आशना हूँ मैं पाक दिलों का
दीद में चाहे जैसा हूँ मैं
मिलते रहे सब बिछुड़ते रहे
तनहा था और तनहा हूँ मैं
कोई मुझे चाहे न चाहे
सबको पसंद करता हूँ मैं
'अनुज' अपने शे'रों के कारण
आज जहां में जिन्दा हूँ मैं
---38.
जमीं नहीं थी रहने को मगर आसमां बहुत था
नहीं थी जिन्दगी मगर जीने का सामां बहुत था
जमाने में अक्सर झुकी है निगाहें उन्हीं की
खुद ही पर जिन्होंने किया गुमां बहुत था
नवाज़िश-ए-वक्त है ये हिज्र हमारी तो
पास रहने का तो हमारा अरमां बहुत था
माना तबस्सुम पे जज्ब-ए-इश्क था मगर
जिगर में उसके भी दर्दे-निहाँ बहुत था
अश्क निकले तो दर्द का गुबार निकला
बहुत बरसों से 'अनुज' परेशां बहुत था
---39.
मेरा दिल है कि यूँ ग़ाफ़िल हो गया
इसने जो चाहा वो हासिल हो गया
डूबने लगा तो मिल गया तिनका
अब तो भंवर भी, साहिल हो गया
तराश दिया उसको भी जुदाई ने
प्यार के तो वो भी क़ाबिल हो गया
तीर की तरह चली उसकी नज़र
और इधर मेरा दिल, बिस्मिल हो गया
दिल में जबसे वो रहने लगा है 'अनुज'
जीना-मरना अपना मुश्किल हो गया
---40.
किस्मत का तारा न मिला आसमां के तारों में
इक भी प्यारा न मिला लाखों में, हजारों में
एक गुल-ए-मुहब्बत की हसरत को लेकर
हमने गुजार दी ये तमाम जिन्दगी खारों में
वफा से मुलाकात होती भी तो कैसे होती
वफा जो ढूँढने गए थे हम, बेवफा यारों में
ज़ख्म खाने की आदत-सी हो गई है अब तो
दिल में आरजू नहीं अब, जीने की गुलजारों में
अब जो है 'अनुज' वो इन मायूसियों में है
मायूसियोें-सी बात कहाँ है दिलकश नजारों में
---41.
आँखों से तीर चलाते क्यों हो
दिल को जख्मी बनाते क्यों हो
कितनी है वफा, दिल में रहकर देखो
अंदाजा चेहरे से लगाते क्यों हो
इश्क नहीं अगर तुमको मुझसे
ख्वाबों में फिर आते क्यों हो
लबों की वो गुम खामोश कहानी
आँखों से ही सुनाते क्यों हो
आता है 'अनुज' जब सामने तेरे
पलकों की चिलमन गिराते क्यों हो
---42.
ख्वाब में आए खुदा ने पूछा- 'क्या चाहिए?'
हँसके बोला मैं- 'वफा के बदले वफा चाहिए'
जिन्दगी की राह में चौहराएं ही चौहराएं हैं
सही राह दिखाए जो, ऐसा रहनुमा चाहिए
जो मुझसे, सिर्फ मुझसे ही करे मुहब्बत
मुझे ऐसी, बिल्कुल ऐसी ही दिलरूबा चाहिए
हम दोनों हों और मुहब्बत हो सिर्फ जहाँ
दूर घने जंगल में इक ऐसा कमरा चाहिए
सहरा है और तेज धूप है गम की 'अनुज'
दोस्त ऐसे में तुमको साया-ए-दुआ चाहिए
---43.
आता नहीं अब सताने ख्याल उसका मुझको
ऐसे लगता हैं जैसे वो भूल गया मुझको
दुनियाँ की बातों में आकर बिछुड़ गया है वो
छोड़ा करता नहीं जो कभी तनहा मुझको
खुदा के बाद एतबार था तो उस पर था
उसने दिया है आज धोखे से धोखा मुझको
ऐसा क्या मिल गया तुमको जो इश्क में न था
मेरी मुहब्बत में थी क्या कमी बता मुझको
वादा करती हूँ, हो गई तेरी, सदा के लिए
अब भी याद है 'अनुज' ये कलाम उसका मुझको
---44.
न दिल होता, न फिर पैदा कोई हसरत होती
न हसरत होती न किसी बात की हुज्जत होती
तासीर-ए-आदमी में काश! अगर ताअत होती
ज़ीस्त के हर आलम में फ़रहत ही फ़रहत होती
निगारखाने की कुछ और ही सूरत होती
नफ़रत में अगर निहां थोड़ी-सी मुहब्बत होती
कसूर तो सारा इन आंखों का ही है 'अनुज'
न यें देखती उसको और न मुहब्बत होती
---45.
आजकल तो हर किसी दिल में दिल्लगी नज़र आती है
औरों को कहें क्या खुद में ही कमी नज़र आती है
मुहब्बत के बिना आलम है ये हर किसी का
चेहरा उतरा हुआ, आँखों में नमी नज़र आती है
प्यार का तो हर कोई करता है बस दिखावा
हाथों में फूल और बगल में छुरी नज़र आती है
पागल तो पहले ही था, कुछ जुदा होकर हो गया हूँ
देखिए अब तो हर नजारे में वही नज़र आती है
धन-दौलत शोहरत सब कुछ हैं खुदा का दिया
बिन उसके तो 'अनुज' हर चीज में कमी नज़र आती है
---46.
मेरा दिल हो गया तेरा, तेरे शहर में
तो हर शख्स जल-सा गया तेरे शहर में
मुझे इश्क करता देख सब कहने लगे
आ गया है कोई सरफिरा तेरे शहर में
इश्क की कदर है न कोई खुदा का डर
ये अजीब दस्तूर है कैसा तेरे शहर में
तरस भी नहीं आया मुझ अजनबी पर
मुझको हर किसी ने लूटा तेरे शहर में
इश्क की जब मैं तालीम देने लगा
मजाके-इश्क उड़ाया गया तेरे शहर में
'अनुज' तो अजनबी है चला जायेगा
फिर हाल क्या होगा तेरा तेरे शहर में
---47.
यूँ तो आज फिर वो हमारे नगर आए
गैर संग देखा तो वो ज़हर नजर आए
मुहब्बत की दौलत है मेरे इस दिल में
मेरी नज़रों से देखो तो नज़र आए
जब भी ज़िक्र कहीं सुना मुहब्बत का
रोने लगा दिल मेरा, नैना भर आए
फिर भी इल्तज़ा है खुदा से बार-बार
हर नजारे में मुझे वो ही नज़र आए
अंधेरों में खो चुका था सब कुछ 'अनुज'
मेरे पास जब तक वो बनके सहर आए
---48.
दिल अपना कहीं लुटा दीजिए
हाथ दोस्ती का बढ़ा दीजिए
जो बात दिल को अच्छी न लगे
उस बात को ही भुला दीजिए
तोड़िए खामोशी इन लबों की
दिल में जो है सुना दीजिए
आतिशे-इश्क फैल जाए जहां में
दिल की लगी को हवा दीजिए
'अनुज' तुमसे और कुछ नहीं माँगता
जिन्दगी भर साथ निभा दीजिए
---49.
अश्क बनकर भी मैं बह नहीं सकता
बात कुछ ऐसी हुई कह नहीं सकता
इतनी अज़ीज़ है मेरे दिल को तू
इक पल की जुदाई सह नहीं सकता
इश्क तो करता है वो मुझसे ही
सरेआम मगर वो कह नहीं सकता
किसी ने ठीक ही कहा है- 'ये इश्क'
जमाने से छिपकर रह नहीं सकता
ऐसी क्या बात देख ली उसमें 'अनुज'
जो तू उस के बिना रह नहीं सकता
---50.
यूँ तो ख्वाहिश सरे-लब बहुत
सोचो तो दिल में तलब बहुत
तारे गिनने से बात न बनेगी
गुजारनी बाकी हैं शब बहुत
इश्क में फनाह फलाँ हो गया
रोने को हमें ये सबब बहुत
ख्याले-वरक़,दर्दे-कलम
दिले किताब में शे'रो अदब बहुत
जहां महकाने को 'अनुज' जी
मुहब्बत का इक हब बहुत
---51.
मुहब्बत में तुम कभी धोखा खाकर देखना
तन्हाई में खुद को कभी रूलाकर देखना
जुदाई की कैसी होती है जालिम जलन
किसी अपने से कभी जुदा होकर देखना
कोई अपना नहीं होता मुहब्बत के सिवा
जहां में, जी चाहे उसे आज़मा कर देखना
हर शै में सूरत मेरी आयेगी नज़र तुमको
कभी वक्त के आईने को उठाकर देखना
बातों में नहीं तो 'अनुज' यादों में रहेगा
कभी बीता हुआ जमाना उठाकर देखना
---52.
अपने दिल में कभी कोई बसाया होता
गम किसी का कभी अपना बनाया होता
जान जाता कि ये इश्क क्या है बला
ज़माने में किसी से दिल लगाया होता
नाम मेरा भी होता हर लब पे अगर
इश्क में हाथ हमने आज़माया होता
सर आँखों पे अपनी बिठाते उसको
गर किसी ने हमें अपनाया होता
लिखता ग़ज़ल जरूर उस पर तो
'अनुज' ख्वाबों में गर कोई आया होता
---53.
नहीं थी किसी चीज की परवा हमें
परवा तब हुई जब इश्क हुआ हमें
चांदनी की चादर ओढ़कर सोते थे
उठाने आती थी सुबह सबा हमें
दिल से बेफ़िक्र, बेपरवाह थे हम भी
इश्क ने तो बन्दी बना लिया हमें
याद है नज़र मिली थी इक हसीं से
पर याद नहीं इश्क कब हो गया हमें
इश्क के असर का क्या कहना 'अनुज'
कर दिया इसने दुनिया से जुदा हमें
---54.
प्यार में यार को रूलाया नहीं करते
वादा करके सनम भूलाया नहीं करते
पलकों पर किसी को बिठाओ अगर
फिर नज़र से उसको गिराया नहीं करते
मुहब्बत तो पाक होती है दोस्त इसमें
फ़कत सूखी हमदर्दी जताया नहीं करते
राहे-इश्क में कदम रखने वाले सुन जरा
कदम रखकर पीछे हटाया नहीं करते
तेरा था तेरा है तेरा ही रहेगा 'अनुज'
बारहा किसी को आज़माया नहीं करते
---55.
प्यार करके तो जख्म नया पाया है
आँखें हैं नम मेरी, दिल घबराया है
न हरे हो सके सूखे फूल मुहब्बत के
यूँ ही आँखों ने सावन बहाया है
न हो सकी रोशनी राहे-इश्क में
जलाने को तो हमने दिल जलाया है
गिला क्या करें आफताब से दोस्तों
हमको तो माहताब ने जलाया है
दिल यकीं 'अनुज' किस पर करे
इक सच्चे दोस्त से फरेब खाया है
---56.
प्यार के बदले हम तो प्यार दें
लेके गम सबसे, खुशी उधार दें
सूरत गर देखना चाहों इश्क की
रूह से बदन का पर्दा उतार दें
देख लो बेशक आज़मा के हमको
तुझ पर अपनी ये जान वार दें
दुश्मनी है तो बता दे हमें भी
हम नहीं है तेरी तरह की खार दें
---57.
जो आरसी-ए-आर पहने होते हैं
वो तो दिल के बहुत अच्छे होते हैं
पढ़ने वाले तो पढ़ लेते हैं चेहरा
सब हाल चेहरे पे लिक्खे होते हैं
मन सच्चा तन सादा है जिसका
इस जहां में चर्चे ही उसके होते हैं
मिलने से उन्हें कौन रोक सकता है
जो एक दूजे के लिए बने होते हैं
मुहब्बत में 'अनुज' दिखावा नहीं होता
दिलबर तो दिल में ही बसे होते हैं
---58.
खुद को खुद से छिपाता क्यों है
आईने के सामने घबराता क्यों है
बेवफाई बस गई है फितरत में तेरी
गीत वफा के गुनगुनाता क्यों है
आँखों की नमी का सबब है गम
इन्हें खुशी के आँसू बताता क्यों है
खुद नहीं देखा कभी आईना तुमने
औरों को फिर आईना दिखाता क्यों है
किस्सा आम हो गया है बेवफाई का
'अनुज' कहते हुए वो शर्माता क्यों है
---59.
जख्मी जिगर हर आशिकी का है
हाल ये आजकल आदमी का है
प्यार की बातें हैं सिर्फ किताबी
तज़रबा ये अपनी जिन्दगी का है
किसको क्या लेना किसी के गम से
सबको ख्याल अपनी खुशी का है
कौन चाहे 'अनुज' दिल को मेरे
दिल पे इख्तियार बस उसी का है
---60.
उसके नूर से इन्सां जुदा नहीं
कोई फिर भी क्यों लगता खुदा नहीं
करके देखा है हमने ये तजरबा भी
झूठ पर देर तक पर्दा रहता नहीं
हरकतें बता देती हैं दिल की बात
बेशक कोई किसी से कुछ कहता नहीं
कोशिशें ही होती हैं अक्सर कामयाब
क्या मीरा को श्याम मिला नहीं?
'अनुज' जिसको अपना दोस्त कहे
जमाने में वो अब तक मिला नहीं
---61.
---
आपकी जुदाई मैं सहूँ कैसे
आपके बिन अब मैं रहूँ कैसे
खफा है मुझसे आज जां मेरी
ये बात औरों से कहूँ कैसे
सूख गया है आँखों का दरिया
बनके आँसू अब बहूँ कैसे
आप कहते तो सह लेता पर
दुनिया के ताने सहूँ कैसे
बात मेरी आप सुनते नहीं फिर
'अनुज' दिल की बात कहूँ कैसे
---62.
देखकर भी नहीं देखा और निकल गए करीब से
दूर तलक देखते रहे हम बनकर बदनसीब से
मुहब्बत के लिए जरूरी है दौलत का होना भी
मिलती नहीं है मुहब्बत सिर्फ अच्छे नसीब से
दौलत, शोहरत है न शक्ल-ओ-सूरत अच्छी
ऐसे में करे कौन भला मुहब्बत मुझ गरीब से
वो क्या है क्या नहीं आज तलक हम समझे नहीं
लगते हैं वो कभी हबीब से, कभी रक़ीब से
तनहा हूँ इसमें मेरा कसूर है न 'अनुज' तेरा कसूर
जो भी हो रहा है, हो रहा है मेरे नसीब से
ÿ ÿ ÿ64.
इश्क वालों से जल रहा है सारा शहर
कैसी तासीर वाला है तुम्हारा शहर
नफरत से करता है यह मुहब्बत बहुत
अजीब मिज़ाज वाला है तुम्हारा शहर
कद्रे-इश्क है न मेहमानों की मेहमां-नवाजी
कुछ तुम्हारी तरह ही है तुम्हारा शहर
इश्क नफरत के इस खेल में जीतेगा कौन
इक तरफ इश्क है दूजी तरफ सारा शहर
तुमसे, तुम्हारे शहर से हो गया है वाफिक
'अनुज' अब आएगा न कभी दोबारा शहर
---65.
प्यार करो हमसे इतना कि चर्चा हो जमाने में
प्यार का असली मजा है तड़पने में तड़पाने में
मेरे दिल को तुम अपना ही घर समझ अ दोस्त
जी चाहे जब तक रहो मेरे दिल के घराने में
तुम मुझसे रूठ भी जाना जल्दी मन भी जाना
प्यार बढ़ता है अ दोस्त रूठने में मनाने में
दिल के हर कोने में रहकर देख लेना तुम
तेरे सिवा कुछ भी न मिलेगा इस दिल दीवाने में
कह दो 'अनुज' से प्यार है दिल से तुम्हें
तुम्हारा क्या जाता है कई बार दोहराने में
---66.
सिर्फ हमें ही नहीं मिले हैं गम कतारों में
फूलों को देखिए रहते हैं जो खारों में
संभलकर आइएगा जरा कि आईने लगे हैं
मेरे घर की छत, फर्श, दर-ओ-दीवारों में
सोने का भाव गिर गया है तब से जमीं पर
सुना है जब से उलफत बिकेगी बाजारों में
परदेश से लौट आईए अब तो 'अनुज' जी
पीपल उगने लगे हैं घर की दीवारों में
---67.
हमको आपकी ये आशिकी अच्छी लगी
और उस पर आपकी सादगी अच्छी लगी
दौरे-गम में आप मेरे साथ जो चल पड़े
आज हमें भी धूप गम की अच्छी लगी
आपके बिना हर खुशी थी गम के जैसी
आप मिले हमसे तो खुशी अच्छी लगी
आपकी नज़रों का वो हमें बारहा देखना
नज़रों की कटारी जो लगी अच्छी लगी
'अनुज' आँखें, चेहरा, दिल और हमको
आपके हसीं लबों की हँसी अच्छी लगी
---68.
मैंने पूछा- 'क्या हुआ, उसने कहा- 'आशिकी'
मैंने फिर पूछा उससे, है चीज क्या आशिकी
रोते हुए को हँसा दे जो हँसते हुए को रूला दे
मैंने सुना है, कुछ ऐसी ही, है बला आशिकी
मैं तनहा, मेरी जिन्दगी तनहा और यहाँ तक
मेरे तनहा दिल में रह गई तनहा आशिकी
दर्द, आँसू, बेकरारी, जुदाई और ये तन्हाई
इसके सिवा दिया है क्या तूने बता आशिकी
जिसको देखा वही मिला दीवाना बदन का
मिला 'अनुज'-सा न कोई जिससे करता आशिकी
---69.
मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो1.
आँखों में आँखें डालके कह दो
'प्यार मुझसे नहीं करते हो'
सखियों संग तुम बैठके अक्सर
क्यों मेरी बातें करते हो
खुदको कमरे में बंद करके
किसके लिए फिर तुम रोते हो
गैर के संग देखके मुझको
सूरज की तरह क्यों जलते हो
मालूम नहीं तुम्हें प्यार के मानी
क्यों इतने भोले बनते हो
सच कहता हूँ कि तुम मुझको
खुशी की तरह अच्छे लगते हो
दिल से तुम्हें चाहता हूँ फिर भी
एतबार क्यों नहीं करते हो
मैं नहीं हूँ तो कौन है फिर वो
जिसके लिए सजते संवरते हो
---
1. यह शे'र डॉ. बशीर बद्र जी का है और यह ग़ज़ल इसी जमीं पर लिखी गई है।
70.
आईने में देखकर शक्ल अपनी रोते हैं हम
तनहाई में इसकदर खौफज़दा होते हैं हम
तेरी चाहत हमारी जरूरत बन गई है शायद
है यही सबब कि तेरे हर नाज ढ़ोते हैं हम
दिन कामों में गुजर जाता है पर शाम होते ही
साक़ी, शराब, महखाने के साथ होते हैं हम
बेबात, बेसबब हमसे ओ नाराज़ होने वाले
जा तेरी इसी बात से नाराज होते है हम
सोचता हूँ रिश्तों को महफूज रखने के लिए
शर्त, समझौता ये सब वजन क्यों ढोते है हम
ज़िंदगी से दामन भी नहीं छुड़ाया जाता 'अनुज'
याद आते तुम, मरने को जब होते है हम
---71.
पतझड़ के बाद आना लाज़मी है जब बहार का
फिर कैसे न करूँ मैं इंतजार अपने यार का
माना रूठ जाने की आदत है उनकी पुरानी बहुत
होता है रूठने वाले को मनाना फर्ज यार का
वो होता भला क्यूँ न हमसे जुदा-ओ-खफा
ये तो दस्तूर पुराना है इस पागल संसार का
मुँह-दर-मुँह रहता था जो कभी मेरी नज़रों के
ईद का चाँद हो गया है आज दीदार यार का
इसी हसरत में जिंदा है ये गरीब 'अनुज'
कभी तो पूछने आएंगे वो हाल बीमार का
---72.
हिज्र में दरमियां दिलों के कभी फासिला नहीं होता
मजबूरी में हर कोई शख्स बेवफा नहीं होता
तेरे शहर में आना जाना है हर रोज का मगर
फिर भी तुमसे मिलने का क्यों हौसला नहीं होता
तरस गई हैं मेरी नज़र तेरे दीदार के लिए
अब क्यों पहली मुलाकात-सा हादिसा नहीं होता
मैं भी होता अगर संगदिल जगह पर आपकी
नाराज होता आपसे मगर आप-सा नहीं होता
कोशिश हजार की आपको भूल जाने की मगर
'अनुज' के दिल से दूर ख्याल आपका नहीं होता
--- 73
कौन देगा तुमको धोखा जिन्दगी
तुम तो हो खुद इक छलावा जिन्दगी
कहना है जो आज ही कह लूं मैं
कल न मिलेगा मौका जिन्दगी
वफा हमने की है कितनी तुमसे
बैठकर कभी क्या सोचा जिन्दगी
बहारों की कैसे उम्मीद लगा लूं
कज़ा का है तू इक झोंका जिन्दगी
इक पल में ही कह दूंगा सारी बातें
'अनुज' को कभी दे मौका जिन्दगी
74
जिस्म जुदा होने से दिल जुदा तो नहीं होते
जरा-जरा सी बातों पर दोस्त खफा तो नहीं होते
गम के तूफां भी होंगे आँसुओं की बारिश भी
खुशियों के मौसम दोस्त सदा तो नहीं होते
मरने के बाद होती है खुदा-सी परस्तिश
जीते जी सभी इन्सां खुदा तो नहीं होते
मजबूर करे बेशक कोई अज़ीज़ की कसम देके
आपकी तरह दोस्त बेवफा तो नहीं होते
लग जाती भनक हमें यदि दगा देंगे वह भी
इस तरह उन पर 'अनुज' फिदा तो नहीं होते
75
सिलसिला दर्द का चला है शायद
दिल का कोई जख्म हरा है शायद
हिचकियाँ मुझको जो आने लगी हैं
याद उसने मुझको किया है शायद
धड़कनों का नामो-निशां नहीं दिल में
अब तो बस वही रहता है शायद
देखकर मुझे कर लिया पर्दा उसने
'अनुज' अजनबी हो गया है शायद
76
मेरे इस जिगर में
फूलों के नगर में
कहीं भी रहो तुम
हो मेरी नज़र में
डूबने में मजा है
इश्क के सागर में
देर है अंधेर नहीं
उस खुदा के घर में
पा लिया 'अनुज' ने तो
खुदा को पत्थर में
77
जिस जिसको परखा हमने उस उसको बेगाना पाया
खुशियों की बस्ती में हमने गम का इक खजाना पाया
रिश्ते, नाते, इश्क, वफा सब बातें ही बातें तो हैं
इन सबमें बस गरज का हमने झूठा अफसाना पाया
प्यार से प्यार ही करने वाला कोई न मिला हमको
जिसको देखा हमने उसको ज़िस्म का दीवाना पाया
राँझे-हीर का किस्सा हो या लैला-मजनूँ का किस्सा
हर सूरत में उल्फ़त का दुश्मन ये जमाना पाया
'अनुज' लाख फरेबों के बावजूद यह दिल तेरा
दिल पसंद, दिल फ़रेब, दिलबर का दीवाना पाया
78
अपने दिल को इश्क का रोग न लगाना था
लगा के रोग, जान से ही तो जाना था
मैं ही तनहा नहीं था इक आशिक उसका
उसका आशिक तो ये सारा जमाना था
रूतबा-ए-मुहब्बत नहीं था उसमें दिखाने को
था तो बस ज़िस्म और कद दरमियाना था
कब तक रखता वो पर्दे में बुराई को
बुराई को इक दिन सामने आना था
'अनुज' ही नहीं जला और भी तो जले हैं
इतना समझ ले तू भी इक परवाना था
79
कभी खुशी में इजाफे के लिए पीजिए
और कभी गमों को छुपाने के लिए लीजिए
प्यार से पिलाए कोई शराब न मना कीजिए
मगर इल्तज़ा है मेरी न बेहिसाब पीजिए
बेहिसाब तो हर चीज बुरी होती है दोस्तों
इसलिए कहता हूँ जब भी लो जरा-सी लीजिए
'अनुज' दिल अब दर्द से तंग आ गया बहुत
अब तो हाथों में मेरे जाम ठहरा दीजिए
80
सब कुछ फैला-फैला है कमरे में
कुछ अच्छा-बुरा हुआ है कमरे में
जब से हुआ है वो जुदा यार से
खुदको बंद रखता है कमरे में
चश्मदीद दीवारें खामोश हैं
सन्नाटा पसरा हुआ है कमरे में
रहबर जग का खुदको बताने वाला
जाने क्या-क्या करता है कमरे में
मकीं शहर से लौटा ही नहीं शायद
परिंदा घोसला बना रहा है कमरे में
तस्वीरें और खामोश हो गई हैं
हर-सू जाला लगा है कमरे में
कुछ किताबे कागजो-कलम रक्खे हैं
जरूर कोई शायर रहता है कमरे में
81
क्या हो रहा है भला कौन पूछै किसे
तमाशा सब देख रहे हैं खड़े-खड़े
दंगा करवाने वाला क्या मरा दंगों में
दर्ज़ा शहीद का दे रही है सरकार उसे
कुर्सी प्यारी है इनको देश प्यारा नहीं
चाहे कोई भूखा मरे या लड़ कर मरे
गरीब दिन-ब-दिन गरीब हो रहे हैं
गुंडे,नेता और बाबा , हैं सेठ बन रहे
न्याय की करें क्या दरकार मुनसीबों से
रिश्वत ले रहे है, रिश्वत लेकर लगे थे
------------------
(समाप्त)
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